अंजर – एक भूले हुए इंसान की कहानी

अध्याय 1: टूटते सपनों की शुरुआत

उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव में अंजर नाम का एक युवक रहता था। गाँव छोटा था, लेकिन वहाँ रहने वाले लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। सुबह सूरज की पहली किरण के साथ खेतों में हल चलने लगते, बच्चे स्कूल की ओर निकल पड़ते और शाम को चौपाल पर लोगों की भीड़ जमा हो जाती। इसी गाँव के किनारे मिट्टी का एक छोटा-सा घर था, जहाँ अंजर अपने माता-पिता के साथ रहता था।

अंजर का परिवार कभी बहुत संपन्न नहीं था, लेकिन मेहनती था। उसके पिता रामदीन खेती करते थे और माँ सीता घर संभालने के साथ-साथ दूसरों के घरों में सिलाई का काम भी कर लेती थीं। परिवार में सुख-सुविधाएँ कम थीं, पर प्रेम बहुत था। रात को जब तीनों एक साथ बैठकर सूखी रोटी और दाल खाते, तो लगता मानो दुनिया की सबसे बड़ी दावत वही हो।

अंजर बचपन से ही शांत स्वभाव का था। उसे पढ़ने का बहुत शौक था। गाँव के स्कूल की छोटी-सी लाइब्रेरी में रखी किताबें वह बार-बार पढ़ता। उसके गुरुजी अक्सर कहते, "अंजर, अगर मेहनत करता रहा तो एक दिन बड़ा आदमी बनेगा।"

अंजर मुस्कुरा देता। उसका सपना था कि वह पढ़-लिखकर नौकरी करे, अपने माता-पिता को मेहनत से मुक्ति दिलाए और मिट्टी के घर की जगह एक पक्का मकान बनवाए।

लेकिन ज़िंदगी हमेशा सपनों के अनुसार नहीं चलती।

उस वर्ष बारिश समय पर नहीं हुई। खेतों में बोया गया बीज सूखने लगा। किसान रोज़ आसमान की ओर देखते, मगर बादल आते और बिना बरसे लौट जाते। धीरे-धीरे पूरे गाँव में चिंता फैल गई। फसल आधी भी नहीं बची।

रामदीन ने साहूकार से उधार लिया ताकि अगली बुवाई कर सकें। उन्होंने सोचा कि शायद अगला मौसम अच्छा होगा। लेकिन अगला मौसम भी पहले से अधिक खराब निकला। इस बार ओलावृष्टि ने बची-खुची फसल भी नष्ट कर दी।

कर्ज बढ़ता गया। साहूकार हर महीने घर आने लगा। उसकी बातें पहले विनम्र होती थीं, फिर कठोर होने लगीं।

"रामदीन, पैसे कब लौटाओगे? ब्याज बढ़ता जा रहा है।"

रामदीन सिर झुका लेते। उनके पास कोई उत्तर नहीं होता।

एक दिन साहूकार अपने आदमियों के साथ आया। उसने बैल अपने कब्ज़े में ले लिए। कुछ दिनों बाद खेत भी गिरवी रखवा लिए। घर का सामान भी धीरे-धीरे बिकने लगा। माँ की वर्षों पुरानी सिलाई मशीन भी चली गई।

उस रात घर में कोई नहीं बोला। केवल दीये की लौ टिमटिमा रही थी।

अंजर ने पहली बार अपने पिता की आँखों में आँसू देखे।

अगले दिन वह स्कूल गया तो उसकी फीस जमा नहीं हो सकी। प्रधानाचार्य ने सहानुभूति जताई, लेकिन नियमों के कारण कहा कि जब तक फीस नहीं आएगी, पढ़ाई जारी रखना कठिन होगा।

स्कूल से लौटते समय अंजर ने अपना बस्ता सीने से लगाया। उसे लगा जैसे उसका सबसे बड़ा सपना उससे दूर जा रहा है।

घर पहुँचकर उसने पिता से कहा, "बाबा, अब मैं पढ़ाई छोड़ देता हूँ। मैं काम करूँगा।"

रामदीन ने तुरंत मना कर दिया।

"नहीं बेटा। गरीबी आएगी-जाएगी, लेकिन पढ़ाई मत छोड़ना।"

अंजर ने पिता की ओर देखा। उनके चेहरे पर मजबूरी साफ़ दिखाई दे रही थी। वह समझ गया कि पिता उसे टूटने नहीं देना चाहते।

कुछ दिनों बाद माँ बीमार पड़ गईं। दवा खरीदने तक के पैसे नहीं थे। गाँव के वैद्य ने जितना हो सका, इलाज किया, लेकिन बीमारी बढ़ती गई।

अंजर सुबह खेतों में मजदूरी करता, दोपहर को ईंट ढोता और शाम को माँ की सेवा करता। उसके हाथों में छाले पड़ गए थे, मगर उसने कभी शिकायत नहीं की।

एक शाम जब वह मजदूरी करके लौटा, तो देखा कि पिता दरवाजे पर चुपचाप बैठे हैं। उनके सामने साहूकार खड़ा था।

"कल तक पैसे नहीं मिले तो यह घर भी मेरा होगा।"

इतना कहकर साहूकार चला गया।

रामदीन देर तक मिट्टी को देखते रहे। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, "लगता है, अब सब कुछ खत्म हो जाएगा।"

अंजर ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी केवल जेब नहीं खाली करती, बल्कि इंसान के आत्मसम्मान को भी घायल कर देती है।

उस रात किसी की आँखों में नींद नहीं थी। बाहर हवा चल रही थी, और भीतर एक परिवार अपने भविष्य के टूटने की आहट सुन रहा था। अंजर ने मन ही मन संकल्प लिया कि चाहे उसे कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, वह अपने परिवार को बचाने की पूरी कोशिश करेगा।

उसे यह नहीं पता था कि यह संघर्ष अभी शुरू ही हुआ है, और आने वाले दिनों में उसकी परीक्षा पहले से कहीं अधिक कठिन होने वाली है।


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